रविवार, 27 दिसंबर 2009

सो गयी प्रतीक्षा थक कर तब गुनगुनाते तुम आये
झुलस बिखर गए आस सुमन तब बदरी बन तुम छाये
यह महज संयोग नहीं प्रिय, हूँ सदियों से शापित मैं
चाह जिस यज्ञ से कुछ पाना बन शर्मिष्ठा हुई अर्पित मैं

1 टिप्पणी:

  1. Khubsurat kavita ke liye dhanyawad! Aisi purani khushbu ab nahi milati hai, kavitaon main. Aasha ahi ki aap yun hi ye khushbu bikharati rahengi, apni rachnayon ke dwara.

    Agali rachana ke intajaar main

    उत्तर देंहटाएं