सोमवार, 5 जुलाई 2010

कहां चले गए बाबू




पिछले दिनों मेरे पिता श्री मार्कण्डेय प्रवासी का आकास्मिक निधन हो गया। वे हिंदी और मैथिली के जाने माने कवि थे। वे आर्यावर्त के पूर्व संपादक थे और १९८१ में साहित्य अकादमी ने अगस्तयायनी महाकाव्य के लिए उन्हें सम्मानित किया था। खास बात यह कि उस समय तक वे सभी भारतीय भाषा में सबसे कम उम्र में इस अवार्ड को हासिल करने वाले शख्स थे। गुवाहाटी से निकलने वाली मैथिली पत्रिका पूर्वोत्तर मैथिली उन पर अपना विशेषांक प्रकाशित कर रही है जिसके अतिथि संपादक श्री भीमनाथ झा हैं। इस पत्रिका के लिए ही उनसे जुड़ी यादें मुझसे मांगी गईं जिसका हिंदी अनुवाद मैं अपने ब्लॉग पर पेश कर रही हंू।



वर्ष २००१ की बात है। तब मैं पटना में फ्रीलांसिंग करती थी। उसदिन हिंदुस्तान के दफ्तर में बैठी थी। प्रेस फोटोग्राफर मित्र चित्राली ने कहा कि ईटीवी जल्दी ही बिहार से शुरू हो रहा है। प्रेमचंद रंगशाला चलो, वहीं से कुछ जानकारी हासिल होगी। दूसरे दिन सुबह बाबू से शेयर करने के लिए बहुत अच्छी-अच्छी बातें थीं। मैंने कहा, बाबू मैं ईटीवी के एक प्रोग्राम की स्क्रिप्ट राइटर और एसिस्टेंट डायरेक्टर हो गई हंू। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि क्या रोज जाना होगा। मैंने भरपूर गर्व से कहा, हां, तब क्या! डिप्टी (ड्यूटी)है, कोई खेल नहीं।
यहां तक की कहानी तो बहुत खूबसूरत थी, पर समस्या तब शुरू हुई जब पता चला कि जल्दी ही शूटिंग शेड्यूल शुरू हो रहा है, जिसमें  मुझे भी नाइट ड्यूटी करनी होगी। अब तो मेरी हालत खराब। नाइट ड्यूटी और मैं। बाबू काट कर रख देंगे। कभी परमिशन नहीं देंगे। परमिशन तो दूर, मैं तो उनसे इस मुद्दे पर बात भी नहीं कर सकती। दिन पर दिन बीता जा रहा था, पर मैं उनसे कुछ पूछ नहीं सकी थी। लगता था कि कॅरियर बनाने का जो ख्वाब मैंने देखा है, वह  कम से कम इस रास्ते तो पूरा होने से रहा। एक दिन सुबह उनके रूम में बैठ कर भोजन कर रही थी। उन्होंने अचानक कहा, ईटीवी में तो शूटिंग के समय रात में भी तुम्हें मौजूद रहना होगा। ऐसा करना, मां को साथ ले जाना। देर रात लौटने में सुविधा होगी। मैं स्तब्ध रह गई। अरे...ऐसा भी हो सकता है! बाबू क्या कह रहे हैं? उन्हें मेरे मन की बात कैसे पता चल गई? फिर शूटिंग में मैं भले सुबह चली जाती, मां रात आठ-नौ बजे तक खाना बनाकर प्रेमचंद रंगशाला पहुंच जाती थीं। फिर रात के डेढ़ बजे या दो, मुझे इसकी कोई चिंता नहीं होती। मां के साथ मैं ऑफिस की गाड़ी से घर आ जाती थी। बाबू ने एक दिन कहा भी कि तुम अकेले भी आ सकती थी, पर मां के साथ रहने से आस-पड़ोस के लोगों को कुछ कहने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए मां का साथ होना जरूरी है।
मैं मानती हंू कि वह दिन मेरे कॅरियर का निर्णायक दिन था। बाद में बतौर स्टाफ भी ईटीवी में मैंने काम किया। फिर अखबार में नौकरी शुरू किया। पर कॅरियर के इस पौधे को पनपने में बाबू के उस दिन के परमिशन ने अमृत जल का काम किया।
बेटी हाउसवाइफ बने, यह शायद बाबू को कभी पसंद नहीं था। लेकिन शाम घिरते ही हमारे लिए घर पहुंच जाना एक अघोषित फरमान सा था। मीडिया में काम करने की अनुमति भी मुझे बहुत मुश्किल से मिली। हिंदुस्तान में जब फ्रीलंासिंग कर रही थी, तब कभी-कभी बेहद आश्चर्य होता कि किसी-किसी दिन रात सात-साढ़े सात बजे तक घर पहुंचने पर भी यदि बाबू वहां दिख जाते तो नाराज नहीं होते। लेकिन एक दिन तो हद हो गई। मैं पटना दूरदर्शन के सलेक्टड कंपेयर पैनल में भी थी।  एक दिन अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का कंपेयरिंग करने का मौका मिला। कार्यक्रम खत्म हुआ तो टाइम देखती हंू, रात के साढ़े नौ बज रहे थे। मेरा तो जैसे खून सूख गया। गेस्ट से पहले घर जाने के लिए गाड़ी का अनुरोध की। डरते-डरते घर पहुंची। अब तो हुआ चेतना, बहुत कर ली कंपेयरिंग। बाबू तो अब निकलना बंद करवा देंगे। घर आयी तो देखती हंू, बाबू किसी से फोन पर बात कर रहे हैं। मेरी तरफ नजर गई तो जिससे बात कर रहे तो, उसे कहने लगे, हां-हां, चेतना आ गई हैं। बात करनी है, लीजिए बात कीजिए। फिर मेरे प्रोग्राम के बारे में भी उन्होंने पूछा कि वह कैसा रहा।
जींस पर लौंग कुर्ता तो मैं अक्सर पहनती थी, पर सहेलियों को देखकर मेरी भी इच्छा हुई कि शॉर्ट शर्ट और जींस पहनू। उनदिनों मैं ईटीवी में काम कर रही थी। जींस शर्ट पहन कर दूसरे गेट से सुबह ऑफिस के लिए निकल गई। शाम के लिए निश्चिंत थी कि जब तक मैं लौटंूगी, बाबू घर से निकल चुके होंगे, इस लिए डर की कोई बात नहीं है। लौटी तो घर की सीढिय़ों पर चढ़ते समय देखती हंू कि बाबू किसी विचार में मगन सीढिय़ों से उतर रहे हैं। बाबू की नजर मुझ पर पड़ी या नहीं, हे भगवान, अब क्या होगा? मैं तेजी से घर में घुस गई। पीछे से बाबू की आवाज भी आई, मि_ू....। मैं डर के मारे पंलग की नीचे घुस गई। बाबू ने बहुत प्यार से मुझ बुलाया। फिर साथ बैठा कर बोले, तुम लड़कों की मानसिकता नहीं समझती हो। ऐसे कपड़े पहनने पर बहुत भद्दी गालियां देते हैं। इसी तरह एक दिन किसी ने मुझे साड़ी के मॉडलिंग का ऑफर दिया। तब भी बाबू ने यही कहा कि मुझे पता है कि तुम  गलत काम नहीं करोगी और तुम्हें जिसने ऐसा ऑफर किया है, उसका भी उद्देश्य गलत नहीं होगा। पर इस फील्ड में अक्सर गलत प्रसार हो जाता है। इसी प्रसंग में एक और बात याद आ रही है। अपने फ्रीलांसिंग के दौर में मैंने कुछ सरकारी विज्ञापनों में अपनी आवाज भी दी थी। यह काम मुझे हिंदुस्तान के किसी साथी के माध्यम से मिला था। बाबू को जब मैंने इस बारे में बताया था तो उन्होंने कहा कि ठी है, काम करो, पर किसी एड के लिए हां करने से पहले पूछ लेना कि किसका विज्ञापन है। एक दिन जब मुझे विज्ञापन में व्हाइस देने के लिए कॉल किया गया तो मैंने पूछा किसका विज्ञापन है? जवाब जो मिला उससे बाबू की बात का मतलब समझ आया। बाबू, कैसे आप सारी बात समझ लेते थे और कितनी अच्छी तरह से मुझे तर्क पेश करते हुए अपनी बात समझाते थे?
सभी भाई-बहनों में मैं ही थी जो बाबू से सबसे ज्यादा क्लोज थी। शादी के बाद भी किसी समस्या पर बाबू को ही फोन करती थी। मां के बारे में सोचती थी कि वह भावुकतापूण जवाब देगी। बाबू ही प्रैक्टिकल समाधान सुझाएंगे। शादी के बाद अपनी नई गृहस्थी शुरू करने जा रही थी, तो उन्होंने कहा, मि_ू ससुराल में कोई मेरी बुराई भी करे तो नाराज मत होना। हालांकि मेरी ससुराल में सभी सुझले हुए और शांत मानसिकता के हैं पर सोचिए कि ससुराल जा रही बेटी के लिए यह कितना बड़ा मंत्र है। साज-समान से लेकर बात-व्यवहार व काम तक प्राय= मैथिला के घर-आंगन में बहुत सहजता से बहूओं के पिता का नाम ले लिया जाता है। अक्सर बड़ी से बड़ी बात पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देने वाली बहुएं पिता तक बात पहुंचने पर उत्तेजित हो जाती हैं और प्रतिक्रिया में जवाब दे देती हैं। ऐसे में बाबू की यह बात बहुत मायने रखती है।
घर में जाति को लेकर कोई सवाल नहीं उठता था। लेकिन इंटरमीडियट में एक सहेली के घर जाकर मैं बेहद पेशोपश में पड़ जाती थी। वह चमार जाति से संबंध रखती थी। भाई जरूर डॉक्टर बन गया था पर उसके माता-पिता अभी भी पुस्तैनी काम करते थे। मैं उसके घर जाती थी तो वह चाय-नास्ता पेश कर देती थी। जब वह थोड़ा इधर-उधर होती थी तो मैं चुपके से खिड़की से चाय-नास्ता फेंक देती थी। बाबू से जब मैंने इस संदर्भ में बात की तो उन्होंने मेरा पूरा ब्रेनवॉश कर दिया। वे कहने लगे कि यह तो तुम बहुत गलत करती हो। मेरे तो कई मित्र एसटी-एससी हैं। मैं तो बहुत सहजता से सबके घर खाता-पिता हंू। आखिर वे भी इंसान हैं। किसी दिन उसे तुम्हारी इस ओछी हरकत के बारे में पता चलेगा तो उसकी भावनाएं कितनी आहत होगी। मैं अगले दिन उसके घर गई और कहा कि बहुत भूख लगी हैं, कुछ खाने को तो दे।
मैथिल समाज खासकर साहित्यकारों में  मैंने कई लोगों को देखा कि दूसरे के बच्चों के घर में हिंदी बोलने पर तो वे जी भर के निंदा करते हैं, पर अपने बच्चे यदि हिंदी-अंग्रेजी बोलते हैं तो गर्व से सीना फुलाए घूमते हैं। मैंने अपने बाबू को इस मुद्दे पर कभी किसी की शिकायत करते नहीं देखा। चार भाई बहनों में सबसे छोटी थी। भाई-बहनों के प्रयोग और पड़ोसियों की संगत का ऐसा असर हुआ कि घर में मैं ही ऐसी निकली जो बोलना सीखी तो हिंदी में। अब तो मां-बाबू परेशान। अपनी भाषा नहीं बोलेगी तो कैसे काम चलेगा। अस्सी के शुरूआती दशक में पटना में विद्यापति पर्व समारोह का बहुत क्रेज था। वर्ष में एक बार होने वाला यह समारोह मैथिली भाषा और संस्कृति को समर्पित था। इसमें तीन दिन तक पूरी रात खुले मैदान में पंडाल लगा कर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता था। मां-बाबू इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ऐसी तैयारी करते मानो किसी विवाह उत्सव में शामिल होना हो। जैसे बच्चों के लिए गर्म कपड़े तैयार करना ताकि खुले मैदान में पूरी रात गुजारने से तबियत नहीं खराब हो। मां-बाबू ने मुझसे कहा कि मैथिली नहीं बोलोगी तो विद्यापति पर्व समारोह में प्रवेश नहीं मिलेगा। इस डर ने असर दिखाया और मैं कम से कम मां-बाबू से मैथिली में बात करने लगी। बाद में इंटरमीडियट में मैथिली एक्सट्रा सब्जेक्ट के रूप में भी उन्होंने मुझे दिलाया ताकि अपनी संस्कृति और भाषा को जान सकंू।
इसी प्रसंग में एक बात और यााद आ रही है। बचपन से अब तक मुझे बाबू शब्द से बहुत शिकायत थी। अरे ये कौन सी बात हुई। मां-बाबू दोनों पढ़े लिखे हैं। कब से पटना में रह रहे हैं। गांव-देहात क्या कहें घर में काम करने वाली बाई के बच्चे भी अपने पैरेंट्स को मम्मी-पापा का सम्बोध देते हैं। हम लोग मां-बाबू बोलते हैं। दोस्तों के सामने कितनी शर्म आती है। लेकिन इन्हें इसकी क्या परवाह। इनके लिए तो मां-बाबूजी अपनी संस्कृति के संबोधन हैं। और बाबू को तो बाबूजी से ज्यादा बाबू शब्द में अपनापन लगता है। धन्य थे आप बाबू। कहां चले गए बाबू। बाबू कहकर पुकारने के लिए भीतर ही भीतर चित्कार मार रही हंू। बाबू...........।

मंगलवार, 4 मई 2010

सांसों में बसी दुआएं

छीन कर

मेरे हिस्से की

मुट्ठी भर खुशी,

खो दिया है

तुमने शायद,

सकून आसमां भर।

मेरी सांसों में अब

बस गई हैं दुआएं

कि तेरी आहों का

तुझ पर न

पड़ जाए असर।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

शुक्र है कि कम हो रहा फैमिली सीक्रेट का कहर

वे इंटरनेट पर चैट करती हैं। उनके कपड़े आधुनिक हैं। अंग्रेजी तो इनकी जबान से ऐसे निकलती है, जैसे मातृभाषा ही हो। विदेश जाना इनके लिए अपने शहर के किसी मार्केट जाने जैसा ही सहज है। आधुनिकता की चकाचौंध में इनकी छवि बेहद मोहक लगती है। पर क्या वाकई ये परम्परागत महिलाओं से अधिक स्वतंत्र हैं। चर्चा का सन्दर्भ सानिया मिर्जा व आयशा सिद्दिकी के प्रकरण से है। टीवी-अखबारों में इन आधुनिकाओं के पूरे प्रकरण को देख सुन कर एक बार फिर इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ा कि परम्परा में महिलाओं की स्थिति जितनी आधारहीन है, उतना ही बनावटी है आधुनिकता के तमाम तामझाम। महिलाएं परम्परा में भी देह तक सीमित करार दी गई थीं और आज भी स्थिति अधिक बदली नहीं। फिर चाहे अपने फिगर के कारण आत्ममुग्धा सानिया हो या फिर मोटापे के कारण हीनभाव से ग्रस्त आयशा।
टीवी चैनलों के कैमरे के सामने बेशर्मी से मुस्कुराते हुए जब शोएब आयशा को आपा तक का संबोधन दे रहे थे और बगल में खड़ी सानिया भी उनकी हां में हां मिलाते हुए मीडिया से ही पूछ रही थी कि आपा से तलाक कैसा तो एकबरगी से रूचिका कांड के डीजीपी राठौड़ और उनकी पत्नी का ध्यान आ गया। अदालत से निकलते हुए कुछ ऐसी अंदाज में मुस्कुराते हुए राठौड़ साहब ने भी 14 वर्षीय छोटी सी बच्ची को लूज मॉरल्स की कहा था और तब भी सती सावित्री की फेम में बंधी उनकी पत्नी ने पति की हां में हां कुछ इसी अंदाज में मिलायी थी। सानिया खेल से आपने जितनी प्रतिष्ठा और मोहब्बत हासिल की है, यकीन मानिए उससे कई गुना अधिक की हकदार हो जातीं, जब आयशा के खेमे में खड़े होकर शोएब के लिए सवाल खड़े करतीं।
इस पूरे प्रकरण में यदि कुछ सकारात्मक दिखा तो वह यह कि समाज में फैमिली सीक्रेट या गोपन की जंजीर जरुर कुछ कमजोर पड़ी है। आयशा को जो कुछ भी सफलता हासिल हुई है वह नारीवाद के प्रमुख सूत्र पर्सनल इज पॉलिटिकल के कारण ही। उन्होंने परिवार की इज्जत के नाम पर चुप रहने की बजाय जमाने के सामने अपनी आवाज बुलंद की। फैमिली सीक्रेट व गोपन की जंजीर को तोड़ा। आज वे कम से कम इस मामले में जरुर हजारों आयशा के लिए प्रेरणा बन गई हैं और यकीनन उनकी यह उपलब्धि सानिया के ड्रॉइंग रूम से सजे ट्रॉफियों से कहीं अधिक कीमती है।

बुधवार, 31 मार्च 2010

अजन्मी वह

शायद दोष
अक्षरों का है
जो खुद को
संजो नहीं पाए
कोरे कागजों पर।
या फिर
कागजों ने ही
की है खता
कि खुद में समेट नहीं पाए
अक्षरों को।
पर सच है कि
खड़े हैं दोनों
समय के कटघरे में
कि एक सुन्दर कृति
रह गई अजन्मी।

मंगलवार, 30 मार्च 2010

आस जगे जब दिया जले

भोर की किरणें छितर जाएं,
(सुबह ऑफिस के लिए निकलने का दृश्य)

दोपहर यंू ही गुजर जाए,
(ऑफिस में काम का दृश्य)

तेरी गंध की जो याद आए,


तनहाई पसर जाए।
(लंच बॉक्स खोलते ही पत्नी की याद)

मिलन हो जब शाम ढले।
(शाम को दोनों अपने-अपने ऑफिस से निकल कर किसी मोड़ पर मिलते हैं।)

साथिया आ पास मेरे,

दो कदम हम भी चलें।

कैसी हुई यह जिंदगानी,

जीते हैं हम उनकी कहानी,
(ऑफिस में बॉस पात्र को कोई निर्देश दे रहा है)


बिखरी पड़ी खुशियां हमारी,

बढ़ता समय अपनी रवानी।
(बॉस प्रजेंटेशन के पेपर असंतुष्टि के साथ टेबल पर बिखेरता है जिसे पात्र हाथों से उठाते हैं)

आश जगे जब दीया जले,
(शाम को ऑफिस से आने के बाद दरवाजे का ताला खोल कर घर में प्रवेश करते हैं। पूरा अंधेरा है और पात्र बल्ब का स्विच ऑन कर एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कुराते हैं।)

साथिया आ पास मेरे,

दो कदम हम भी चलें।


कविता की ये पंक्तियां शायद आधी-अधूरी हैं पर मेरे दिल के बेहद करीब हैं। कहानी शुरू करने से पहले बता दंू कि यह वर्किंग कपल पर बनने वाले एक धारावाहिक के टाइटिल सॉन्ग का हिस्सा है जिसे मैंने वर्ष २००३ की शुरूआती तिमाही में ईटीवी बिहार के लिए लिखा था। उनदिनों मैं वहीं काम करती थी। एक दिन प्रोड्यूसर राजीव मिश्रा ने मुझसे कहा कि शहर के वर्किंग कपल की दिनचर्या पर एक धारावाहिक दो कदम हम भी चले तैयार करना है। पायलट एपिसोड के लिए कोई अट्रैक्टिव कपल हो तो बताओ। मैंने झट से निवेदिता झा का नाम लिया। वे उन दिनों राष्ट्रीय सहारा में थीं। उनके पति डॉक्टर हैं। निवेदिता जी की पूरी पर्सनैलिटी मुझे बेहद आकर्षक लगती थी। लंबा कद, सुन्दर चेहरा, लंबे बाल...और सबसे खास उनकी बड़ी सी गोल लाल बिंदी। बिल्कुल जीवंत कविता सी। और उनका जीवन रोमांचक कहानी सा। समाज से संघर्ष कर दूसरे धर्म में शादी और शादी के बाद अपनी पहचान कायम रखने के लिए फिर
एक नए समाज से जूझना। (पिछले दिनों भी तो राष्ट्रीय सहारा प्रबंधन से किसी मुद्दे पर डट कर लडऩे और फिर समपर्ण की जगह कहीं और ज्वॉइन करने की खबर भड़ास फोर मीडिया में पढ़ी थी।)
खैर...मैंने राजीव जी के सामने उनकी पर्सनैलिटी का कुछ ऐसा ही चित्र खींच दिया। बस क्या था..., शाम को हम उनके बोरिंग रोड स्थित सुन्दर से फ्लैट में थे और उनकी जिंदगानी से रूबरू हो रहे थे। नाम फायनल हुआ तो राजीव जी ने तुरन्त ही इसका टाइटिल सॉन्ग लिखने को कहा। फिर मैंने यही कुछ पंक्तियां लिखी थी। धारावाहिक अभी कागजों पर ही था कि जून महीने में मेरी शादी हो गई और मैं बाबुल का आंगन ही नहीं एग्जीबिशन रोड स्थित अपना दफ्तर भी छोड़ कर राजस्थान चली आई। दो महीने के भीतर ही मैंने भास्कर ज्वॉइन कर लिया और इन पंक्तियों को अपनी दिनचर्या में मौजूद पाया। खासतौर पर
आश जग जब दिया जले....।

रविवार, 7 मार्च 2010

यह औरतों का काम क्या होता है

अभी दो दिन पहले ही ऑफिस में महिला दिवस स्पेशल अंक पर चर्चा हो रही थी। इस अंक को पूरे दैनिक भास्कर नेटवर्क की 18 महिलाएं तैयार कर रही हैं। इनमें दो हमारे सेंटर (जयपुर) की भी हैं। चर्चा के दौरान हमारी एक अन्य महिला सहकर्मी ने मजाकिया लहजे में कहा कि मुझे भी इस टीम में शामिल होने के लिए किसी ने कहा था, पर औरतों के काम में मेरी कोई रुचि नहीं।बात छोटी सी है, पर मुद्दा पुराना है।
काम , गुण, प्रवृति... इन को हम औरताना और मर्दाना में बांटना कब बंद करेंगे ? कब तक बेटे के रोने पर उसे, क्या लड़कियों की तरह रोते हो कह कर चुप कराएँगे। इसके लिए सेमिनारों, उबाऊ भाषणों या आयोजनों की उठा-पटक की बजाय रुटीन में छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखना अधिक असरकारक होगा।
हमारे एक बहुत सीनियर सर हैं। इन दिनों भोपाल में पदस्थ हैं। इनके साथ मुझे करीब दो वर्षों तक काम करने का अवसर मिला . मैंने उन्हें कभी महिला मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बातें करते नहीं सुना। पर व्यवहार में वे जो छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखते हैं, वह महिला सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण सूत्र सा लगता है। एक छोटा सा उदाहरण देखिए। वे हमें घूघंट वाली फोटो अक्सर अवॉइड करने की सलाह देते हैं। बात छोटी सी है, पर महिलाएं जिस संक्रमण के दौर से गुजर रही हैं, उसमें ऐसे कदम बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं। महिलाओं पर जहां एक ओर के बाहर आधुनिकता अपनाने का दवाब है, वहीं घर के भीतर उनसे वही पुरानी छवि की मांग की जाती है। मतलब, आप अच्छे पद पर हैं, अच्छा कमा रही हैं, तो बहुत अच्छी बात है। इससे घर के सामाजिक और आर्थिक रुतबे में इजाफा होता है। पर घर घुसते ही 6 हाथ की साड़ी में अपनी गतिशीलता समेट कर अपनी हद में आ जाएं। कम से कम घर के छोटे-बड़े आयोजनों में तो उनसे यही उम्मीद की जाती है। यह घूंघट महिलाओं की गतिशीलता में सबसे बाधक है। यह उतनी ही दूर देखने की इजाजत देता है जितना घर के मर्द चाहते हैं। इस सन्दर्भ में चर्चा चलने पर राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष विभा पार्थसारथी का करीब 10 वर्ष पहले दिया गया इंटरव्यू भी याद आ जाता है। उन्होंने लिखा था कि नन्हें बेटे के लिए किताब खरीदने गईं तो किताब चाहे हिन्दी में लिखी गई हो या अंग्रेजी में, पुरुष ही पुरुष छाए थे। उन्होंने उन •किताबों में पुरुषों के बने कुछ चित्रों को कलम की सहायता से लड़कियों का रूप देना शुरु किया .छोटी सी बात, पर फिर वही गहरे असर वाली। बच्चे के संस्कार को प्रभावित करने वाली।
हम शर्माते हैं, आधिक महत्वाकांक्षा नहीं पालते, चूहों-काक्रोच से डरते हैं...महिलोचित माने जाने वाले इन गुणों के प्रदर्शन से अक्सर हमें कंही न कंही खुशी मिलती है। क्रोध , साहस के प्रदर्शन से बचते हैं कि कहीं हम लेस फेमिनाइन नहीं मान ली जाएं। छोटी सी बच्ची से पूछिए, फेवरिट कलर क्या है, झट से बोल देगी-पिंक । क्यों पिंक ही...फिर वही बात कि यह संस्कार तो हमने ही उसमें कहीं ना कहीं पिरोया हैं।हम डरते हैं कि बेटी लडक़ी कि तरह नहीं पलेगी तो उसे एडजस्टमेंट में दिक्कत होगी।
जब बात एडजस्टमेंट की उठी है तो स्पष्ट कर दूं kइ मनोविज्ञान हमारी इस आशंका को बिलकूल निराधार मानता है। मनोविज्ञान यह स्पष्ट कर चुका है कि सफल और सुव्यवस्थित जीवन जीने के लिए औरतों के गुण यानी स्नेह, ममता, सहनशीलता, उदारता आदि की जितनी जरुरत होती है उतना ही जरुरी होता वीरता, सहस, क्रोध जैसा पुरुषों का माना जाने वाला गुण। यानी एक अच्छा और सफल व्यक्तित्व वही है जिसमें महिलाओं व पुरुषों, दोनों के गुण संतुलित मात्रा में उपलब्ध हों। मनोविज्ञान ऐसे व्यक्तित्व को एंड्रोजेनस कहता है। अपनी भारतीय संस्कृति में इसे ही अर्धनारीश्वर का नाम दिया गया है। तो इस महिला दिवस पर हम प्रण लें कि कामों गुणों व प्रवृतियों को महिला और पुरुष के खाने में बांटना बंद करेंगे । बच्चों को ऐसे संस्कार दें कि वह उसे ही हीन नहीं समझे, जो नौ महीने न केवल उसे कोख में रखती है बल्कि बाद के जीवन के भी करीब चौथाई हिस्से तक उसके शारीरिक - मानसिक विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहती है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मासूम चाहत

सोते- सोते,
कभी रोती है,
कभी हंसती है।
कच्चे दूध सी,
मेरी मासूम चाहत
महकती है।

कभी पेट पर,
कभी छाती पर,
गुदगुदाते हैं
उसके नन्हें पांव।
सच का सूरज,
जब जलाता जिया,
किलकारी बनकर
मेरी मासूम चाहत
बरसती है।

कलेजे के टुकड़े को,
कलेजे से बांधूं।
आंखों के तारे को,
आंखों से निहारूं ।
कुछ ऐसी ही ख्वाहिश,
दिल में कलपती है।
मेरी मासूम सी चाहत
आंसू बन भटकती है।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

दो छोटी •विताएं

दो छोटी •विताएं
ए•
बहुत पानी है तुम्हारे बिना
और बहुत प्यास भी।
बहुत निराशा है तुम्हारे बिना
और बहुत आस भी।
असमंजस और आश्वासन
दोनों तुम्हारे बिना
और तुम्हारे साथ भी।

दो
खामोशी •ी भाषा में
बैचेनी •ी लिपि में
उस अजन्मे रिश्ते ने
•ितनी चीखें मारी
•ितने •िए सवाल
हाय! अरसे बाद क्यों
हाथ लगी वह
धूल भरी •िताब और
भीतर •ा सूखा गुलाब।

दो छोटी कविताएं

ए•
ए•बहुत पानी है तुम्हारे बिना और बहुत प्यास भी। बहुत निराशा है तुम्हारे बिना और बहुत आस भी। असमंजस और आश्वासन दोनों तुम्हारे बिना और तुम्हारे साथ भी।
दो
खामोशी •ी भाषा मेंबैचेनी •ी लिपि मेंउस अजन्मे रिश्ते ने•ितनी चीखें मारी•ितने •िए सवालहाय! अरसे बाद क्योंहाथ लगी वहधूल भरी •िताब औरभीतर •ा सूखा गुलाब।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

यहां कहां सृजन

हो रही तब्दील पत्थर में,
जिसमें न स्पन्दन है,
और न सृजन!
चिडिय़ों की चहचहाहट
सी किलकारी भी
पड़ोस के पेड़ों तक सीमित,
सूना मेरा आंगन!
चरम पर है
फूट कर बहने की चाहत
सहूं असीम पीड़ा का सुख
गंूजे उसका रुदन!
कपोल फूटने का स्वप्न लिए
झुकती हैं आंखें,
पर वहां फिर न सृजन
न स्पन्दन!
बस बहती हैं आंखें
बिना सींचे कोई फसल
भटकता है पानी
निरुद्देश्य, निरर्थक।
और फिर यह पानी
आग में हो जाता तब्दील
बचती है बस
राख और धुआं,
यहां कहां सृजन
कैसा स्पन्दन!

यहां कहां सृजन

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

बस नजरों भर आकाश

भगाने को
मन का अंधकार,
काफी है एक
टिमटिमाता दीया!
पलटकर एक नजर
देखना उनका
जोड़ जाता है जिया!
मु_ी भर सकून,
नजरो भर आकाश,
आंचल में लंू समेट
बस इतना दो प्यार!
टूटे नहीं लय-छंद,
दास्तां नहीं यह
हार-जीत की,
चाहत बस इतनी सी
जीवन में
कविता रहे बरकरार!

कुछ पाती एक शाम के नाम

हां, मैं उदास हंू,
तन्हाइयों के पास हंू।
दूर तक
विस्तार है,
अंतहीन
आकार है,
चांद-तारों बिना
मैं आकाश हंू।
हां, मैं उदास हंू।
बंजर
जमीन है,
नभ
नीर हीन है,
बिखरे बीज का
मैं प्रयास हंू।
हां, मैं उदास हंू।

रविवार, 24 जनवरी 2010

आज अरसे बाद फिर
पिघला कुछ मन में
लाओ, कलम दो
कविता उमड़ती है।

भावों के बादलों से
आकुल-व्याकुल मन है
कोई स्नेहिल आंचल दो
आंखें बरसती हैं।

मन ही नहीं चाहता पढऩा
मन की मौन भाषा
कौन सुनेगा इसकी
आंखें कुछ कहती हैं।

बनोगे मेरी अभिव्यक्ति

हां, तुम याद आओगे
आंखों से बरस जाओगे।
जब तपस सी होगी उलझन
झुलसने लगेगा फसल मन
हर्षाने को कण-कण
बदरी बन कर छा जाओगे
हां, तुम याद आओगे।

लगने लगेगी लंबी रात
अंधकार देगा सतत आघात
लाने का स्वर्णिम प्रभात
सूरज-सा तप जाओगे
हां, तुम याद आओगे।

जब जन्म लेगी संवेदना अनूठी
अकुलाएगी अज्ञात अनुभूति
देने को सशक्त अभिव्यक्ति
मेरी कविता बन जाओगे
हां, तुम याद आओगे।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

आज फिर हो गयी

जिंदगी से मुलाकात

फिज़ाओं ने हाल पूछा

लम्हों ने की बात!

गुनगुनी धूप ने

jee bher निहारा मुझे

छू कर मेरा बदन

हवा ने सराहा मुझे

उद्वेलित हुई भावना

पकड़ कर मेरा हाथ!

आज फिर हो गयी

ज़िन्दगी से मुलाकात!

बादलों की ओट से

छिप-छिप कर झांकता,

बावरा है सूरज क्या

देख मुझको नाचता.

उमंग के गर्भ में

ले रहा आकार गीत,

उल्लास को धीरज कहाँ

सुना रहा सोहर संगीत।

लौट बचपन की गलियों में

मन सोच रहा खुराफात।

आज फिर हो गयी

ज़िन्दगी से मुलाकात.