मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मासूम चाहत

सोते- सोते,
कभी रोती है,
कभी हंसती है।
कच्चे दूध सी,
मेरी मासूम चाहत
महकती है।

कभी पेट पर,
कभी छाती पर,
गुदगुदाते हैं
उसके नन्हें पांव।
सच का सूरज,
जब जलाता जिया,
किलकारी बनकर
मेरी मासूम चाहत
बरसती है।

कलेजे के टुकड़े को,
कलेजे से बांधूं।
आंखों के तारे को,
आंखों से निहारूं ।
कुछ ऐसी ही ख्वाहिश,
दिल में कलपती है।
मेरी मासूम सी चाहत
आंसू बन भटकती है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .....एक नन्हे से बच्चे की पूरी चंचलता से पूर्ण है ये रचना .

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  2. अति सुन्दर । मासूमियत से भरी रचना । बधाई ।

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  3. बहुत अच्‍छी रचना। ऐसा लग रहा है जैसे आपने अपने बच्‍चे के उपर लिखा हो। मगर बेहतरीन प्रयास है। जारी रखें।
    सुनील पाण्‍डेय

    इलाहाबाद।

    09953090154

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