रविवार, 27 दिसंबर 2009

तुम ताज महल हो

दर्शनीय, मुग्धेय,

शांतिदाता

मुखरित, पवित्र,

प्रीतिगाथा

पर मेरी भावना से अंजान अलग हो

तुम ताजमहल हो।

करती तुझसे बेहद प्यार

तुम आकर्षण की मूर्ति साकार

तुम मेरा उत्साह,

मेरी चहल-पहल हो

तुम ताज महल हो,

तुम ताज महल हो।

tउम्हर सामीप्य

देता सकूँ

सामर्थ्य कहाँ

तुझमे रहूँ

तुम शहंशाहों के

ख़ास शगल हो

तुम ताजमहल हो

तुम ताजमहल हो।

रहोगे कैसे

यूँ अनछुए

शब्द जो मेरे

संगी हुए

बाँध लिया तुझे

तुम मेरे गजल हो

तुम ताजमहल हो,

तुम ताजमहल हो.

1 टिप्पणी:

  1. ब्लॉगर्स की दुनियां में आपका स्वागत है। बधाई हो। बहुत ही प्यारी रचना। एक-एक शब्द मन को छू लेने वाला। उम्मीद है आगे भी इसी तरह की रचनाएं आपके ब्लॉग पर पढऩे को मिलेंगी। अभी तो बस यही कह सकता हूं-
    आपसे तो मुलाकात थी अक्सर
    आपके इस हुनर से रूबरू आज हुए
    शिवराज गूजर
    meridayari.blogspot.com

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